New Delhi, 30 अगस्त . भारत के 13वें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बारे में कहा जाता था कि वे कभी भी ‘सच को सच’ कहने से नहीं हिचकिचाते थे. इस आदत की वजह से उन्हें राजनीतिक करियर में नुकसान भी उठाना पड़ा. कांग्रेस में इंदिरा गांधी के सबसे चहेते होने के बावजूद 50 साल की अपनी राजनीति में प्रणब मुखर्जी की भारत के Prime Minister बनने की महत्वाकांक्षा अधूरी रही.
कांग्रेस में एक किस्सा है कि 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के तुरंत बाद प्रणब मुखर्जी के Prime Minister बनने की सुगबुगाहट शुरू हुई थी. उस वक्त Prime Minister का स्थान खाली हो गया. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद Prime Minister पद के लिए नाम तय करना चुनौती बन गया था. उस वक्त वरिष्ठता की सूची में प्रणब मुखर्जी थे और वही Prime Minister के लिए स्वाभाविक दावेदार माने गए. इसके पीछे इंदिरा गांधी के साथ उनके बेहतर रिश्ते रहे.
हालांकि, उसी समय प्रणब मुखर्जी के साथ राजीव गांधी के मनमुटाव की चर्चाएं रहीं. रशीद किदवई ने अपनी एक किताब ’24 अकबर रोड’ में एक जगह लिखा, “एक ब्योरा ये है कि इंदिरा गांधी की मौत से दुखी होकर प्रणब मुखर्जी विमान के टॉयलेट में जाकर रोए. उनकी आंखें लाल हो चुकी थीं. वे विमान के पिछले हिस्से में जाकर बैठ गए, लेकिन कांग्रेस में उनके विरोधियों ने इस वाकये को राजीव गांधी के खिलाफ उनकी साजिश के तौर पर पेश किया था.”
एक अन्य विवरण में कहा गया है कि राजीव गांधी ने इंदिरा गांधी के निधन के बाद प्रणब मुखर्जी से मुलाकात की थी. राजीव ने Prime Minister पद को लेकर चर्चा की थी, तो प्रणब ने वरिष्ठता पर ज्यादा जोर दिया. प्रणब के इस भाव को बाद में उनकी Prime Minister बनने की इच्छा के तौर पर इस्तेमाल किया गया था.
हालांकि, राजीव गांधी जब खुद Prime Minister बने तो इंदिरा गांधी के बाद नंबर दो की हैसियत वाले प्रणब मुखर्जी को उनकी कैबिनेट में जगह तक नहीं मिली.
हालांकि, प्रणब मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा के दूसरे खंड “द टर्बुलेंट इयर्स: 1980-1996” में Prime Minister बनने की महत्वाकांक्षा के दावों को खारिज किया. प्रणव मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा के दूसरे खंड में लिखा, “इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उन्होंने कभी भी राजीव गांधी को Prime Minister बनने से रोकने की कोशिश नहीं की. उन्हें उस दौरान फैलाई गई इस भ्रांति की कीमत कांग्रेस से उपजी दूरी के तौर पर चुकानी पड़ी थी.”
प्रणब मुखर्जी इंदिरा गांधी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी थे, लेकिन राजीव गांधी के साथ मतभेद के कारण उन्हें कांग्रेस छोड़नी पड़ी. बाद में पूर्व Prime Minister पीवी नरसिम्हा राव ने उन्हें फिर से पार्टी में शामिल किया.
सिर्फ उसी समय नहीं, बल्कि उसके बाद दो और मौके आए, जब ‘प्रणब दा’ शीर्ष पद पाने से चूके. 1991 के चुनावों में कांग्रेस को बहुमत मिला और प्रणब मुखर्जी फिर से Prime Minister पद की दौड़ में थे, लेकिन पूर्व की ‘अति महत्वाकांक्षी’ छवि उनके खिलाफ गई. सोनिया गांधी ने इस बार भी उनका समर्थन नहीं किया और पी. वी. नरसिंह राव को Prime Minister बना दिया.
बाद में प्रणब मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा, “उन्होंने सत्ता के दो पहलुओं से निPatna सीख लिया था. असफलताओं और बुरे समय ने उन्हें साहस सिखाया, जबकि सफलता ने उन्हें विनम्र बनाया.”
2004 का साल प्रणब मुखर्जी के लिए फिर से एक बड़ा अवसर लेकर आया. तब सोनिया गांधी ने विदेशी मूल के कारण पीएम पद ठुकरा दिया, तो कयास लगाए गए कि अनुभवी प्रणब मुखर्जी को मौका मिलेगा. अटकलें लगाई जा रही थीं कि शासन और संसद में उनके व्यापक अनुभव को देखते हुए मुखर्जी पार्टी की पहली पसंद हो सकते हैं, लेकिन सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को Prime Minister बनाया.
2004 के संदर्भ में प्रणब मुखर्जी ने अपनी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी से कहा था कि सोनिया गांधी उन्हें Prime Minister नहीं बनाएंगी. शर्मिष्ठा मुखर्जी ने अपनी किताब ‘ प्रणब माई फादर: ए डॉटर रिमेम्बर्स’ में सोनिया गांधी के Prime Minister पद की दौड़ से हटने के फैसले के बाद अपने पिता के साथ फोन पर हुई बातचीत का जिक्र किया. इस किताब में लिखा है कि जब उन्होंने अपने पिता से Prime Minister पद को लेकर सवाल किया, तो उनका जवाब था कि नहीं, वह (सोनिया गांधी) मुझे Prime Minister नहीं बनाएंगी.
प्रणब मुखर्जी एक ऐसे राजनेता थे जो सत्ता के बेहद करीब होते हुए भी Prime Minister की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाए. लेकिन उनके अनुभव, संतुलन और दूरदृष्टि ने उन्हें भारतीय राजनीति का एक स्तंभ बना दिया. मुखर्जी ने 25 जुलाई 2012 को भारत के 13वें राष्ट्रपति के रूप में पदभार ग्रहण किया. इससे पहले, वे पांच बार राज्यसभा से और दो बार Lok Sabha से चुने गए. 31 अगस्त 2020 को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का निधन हो गया था.
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डीसीएच/एएस
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